सोमवार, 29 अगस्त 2011

आर्थिक गुलामी के 20 वर्ष : कारण और समाधान



पिछले 20 वर्षों के दौरान भारतीय अर्थतंत्र में ढेर सारे बदलाव किये गये। इसने भारतीय समाज और जनजीवन को गहराई से प्रभावित किया। शासक वर्ग इन बदलावों को विकास के नये युग का नाम दे रहे हैं। उनका कहना है कि भारत की आर्थिक विकास दर 9 प्रतिशत से भी आगे जा चुकी है और जल्दी ही 10-12 प्रतिशत तक पहुँचने वाली है। शेयर सूचकांक एक समय 21000 तक जा पहुँचा था और आज भी यह 18000 से ऊपर बना हुआ है। विदेशी मुद्रा भण्डार 262 अरब डॉलर हो गया है। हमारे प्रबन्धन संस्थानों से निकले स्नातकों की दुनियाभर में माँग बढ़ रही है। इत्यादि।
    रेडियों, टीवी चैनल, अखबार, पत्र-पत्रिकाएँ, व्यवस्था-पोषक बुद्धिजीवी-पत्रकार, साम्राज्यवादी देशों की सरकारें, बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रबन्धक, देशी-विदेशी पूँजीपति, नेता, नौकरशाह एक सुर में इस विकास का राग अलाप रहें हैं। इनका मानना है कि भारत 'उभरती हुई अर्थ व्यवस्थाओं' की अगली कतार में है और जल्दी ही यह 'आर्थिक महाशक्ति' बनने वाला है। उनके अनुसार यह चमत्कार 1991 में नयी आर्थिक नीति के लागू होने के साथ शुरू हुए आर्थिक सुधारों की सफलता का परिचायक है।
आर्थिक विकास के ये आँकडे  काफी हद तक सही हैं। इसने देश की एक छोटी सी आबादी को मालामाल किया है। लेकिन यह पूरी भारत की सच्चाई नहीं है। जब हम देश की बड़ी आबादी पर निगाह डालते हैं तो इस चमचमाते विकास की कलई खुलने लगती है। मीडिया के अंधाधुंध प्रचार और आंकड़ों  के मायालोक से बाहर निकलते ही 'सुधार' जैसे मोहक और भ्रामक शब्द के पीछे छिपी क्रूरतम सच्चाइयाँ हमारी आँखों के आगे नाचने लगती हैं।
      इन नीतियों के जरिये हमारे देश के शासकों ने मुट्‌ठी भर लोगों के लिए स्वर्ग का सृजन किया है, जबकि बहुसंखयक आबादी की जिन्दगी को नरक से भी बदतर बना दिया पोस्ट प्रकाशित करेंहै। इस आलेख में देश को आर्थिक गुलामी की ओर ले जाने वाली इन नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणामों पर एक सरसरी निगाह डालते हुए इसके कारणों पर गहराई से विचार किया जायेगा ताकि हम समस्या के सही समाधान की दिशा में आगे बढ  सकें।

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