बुधवार, 8 नवंबर 2017

नोटबन्दी : बेरहम सरकार की कुटिल कुचाल

(यह लेख मैंने देश विदेश अंक-25 में फरवरी 2017 को लिख था। इससे पहले 8 नवम्बर 2016 को प्रधानमन्त्री मोदी ने नोटबन्दी  की घोषणा की थी जिसके चलते 500 और 1000 के पुराने नोट बेकार हो गए लेकिन इस नोटबन्दी ने भारत की जनता की जिंदगी पर घातक और देश की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डाला इस लेख में इन्हीं प्रभावों का विश्लेष्ण है आज एक साल बाद यह लेख पहले से भी ज्यादा प्रासंगिक है यह लेख उन बातों की भी याद दिलाता है जो स्मृति से लगभग मिट सी गयी हैं और जिन्हें याद करना अब फैशन नहीं रह गया है)

नोटबन्दी लागू हुए तीन महीने बीत गये हैं। अब थोड़ी तसल्ली से इस फैसले की जाँचपड़ताल की जा सकती है। 8 नवम्बर को नोटबन्दी की घोषणा करते हुए प्रधानमन्त्री ने तीन दावे किये थे। उन्होंने कहा था कि नोटबन्दी से आतंकवाद पर लगाम लगेगी, जाली नोटों पर शिकंजा कसा जायेगा और कालाधन, यानी भ्रष्टाचार मिट जायेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसके उलट, नोटबन्दी के बाद जनता की दु:खतकलीफें बढ़ गयीं। एटीएम और बैंकों से पैसे निकालने की सीमा बाँध दी गयी जो आज भी जारी है। इससे एटीएम और बैंको के बाहर लोगों की लम्बी कतारेें लग गयीं। मोदी जी ने गोवा की एक रैली में कहा कि उन्हें नोटबन्दी के लिए 50 दिन दे दीजिये। बाद में उन्होंने जज्बाती अन्दाज में कहा कि गरीब खुश हैं और भ्रष्ट लाइन में लगे हैं। इसके बाद वे भावुक होकर रोने लगे। हालाँकि वे कितने दु:खी थे, इसका पता तो तभी चल गया, जब इस गम में उन्होंने अपनी अगली रैली में एक दिन में तीन बार पोशाक बदली।
नोटबन्दी के इस फैसले के चलते एटीएम और बैंकों की कतारों में गिरकर और नकदी की कमी से इलाज न मिल पाने के चलते सौ से अधिक लोग मारे गये। वित्तमन्त्री ने जनता की तकलीफों का मजाक बनाते हुए उसकी बदतर हालत की तुलना अंग्रेजों के खिलाफ आजादी के संघर्ष मंे जनता के त्यागबलिदान से कर दी। यह जनता के जख्मों पर नमक लगाने जैसा साबित हुआ। लोग भड़क गये। व्यक्तिगत स्तर पर और छोटे ग्रुपों में लोगों ने अपना विरोध जताया। विरोध के वीडियो बनाकर यूटयूब और फेसबुक जैसी सोशल वेबसाइटों पर अपलोड किये गये। इन वेबसाइटों पर सरकार के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। गालीगलौज और जनता के गुस्से का पारा गर्म हो गया। एक ओर बिकाऊ मीडिया ने जनता की समस्याओं से मुँह चुराया तो दूसरी ओर उसने एक सुर में सरकार के फैसले का आँख मूँदकर समर्थन किया। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को जनता के ऊपर सर्जिकल स्ट्राइक बताया।
अपनी जमीन से उखड़ा मध्यम वर्ग भी टीवी चैनलों और प्रिंट मीडिया के प्रचार से सरकार के प्रभाव में आ गया। मध्यम वर्ग ने कार्ड स्वैप करके खरीददारी की। उसे एटीएम के आगे लाइन लगाने की जरूरत नहीं पड़ी। इसके चलते मध्यम वर्ग ने सरकार का साथ दिया। इसका पुरस्कार देते हुए सरकार ने नौकरीपेशा मध्यम वर्ग के टैक्स में 5 फीसदी की कटौती भी कर दी। मीडिया, मध्यम वर्ग, पूँजीपति और भाजपा के कार्यकर्ता नोटबन्दी को बढ़िया कदम बताते रहे। सरकार के धुँआधार प्रचार के बावजूद सच्चाई इतनी भयानक थी कि उसे लोगों से छिपाना मुश्किल हो गया। प्रधानमन्त्री ने जनता से 50 दिन की मुहलत माँगी और अपने मोहक शब्दजाल में उन्होंने यह भी कह दिया कि अगर भ्रष्टाचार कम न हुआ तो उन्हें चैराहे पर जो चाहे सजा दीजिए, उन्हें मंजूर होगी। उन्होंने जूते से पीटने और पोल से लटकाने जैसी बातें भी कही।
हालाँकि सभी जानते थे कि 50 दिन बाद कुछ भी नहीं होने वाला था। 50 दिन जैसेजैसे करीब आते गये, फोड़ा फूटकर मवाद बहने लगा। बैंक अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त पाये गये जो अब तक भ्रष्टाचार से दूर थे। बैंकों के ऊँचे अधिकारियों ने अकूत कमाई की। भाजपा नेताओं के पास 2000 रुपये के गुलाबी नोटों के लाखोंकरोड़ों जब्त होने का अन्तहीन सिलसिला चल पड़ा। हरियाणा में रोडवेज कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। मामला यह था कि उनके अधिकारियों ने उन्हें 100–100 के नोट लाने का आदेश दिया था, जिसे वे 500 और 1000 के नोट से बदलने में इस्तेमाल कर रहे थे। जब रोडवेज कर्मचारी बस यात्रियों से 100 रुपये के लिए दबाव डालने लगते तो मारपीट की नौबत आ जाती। एक रोडवेज कर्मचारी की हार्ट अटैक से मौत हो गयी। दोनों ओर से पाटों में पिस रहे रोडवेज कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। परेशान हाल जनता ने कई जगह बैंक और एटीएम पर पथराव किया। कश्मीर में आतंकवादियों के पास 2000 के नये नोट जब्त किये गये, इससे आतंकवाद पर लगाम कसने की बात खोखली साबित हो गयी। हालाँकि नोटबन्दी करके आतंकवाद पर रोक लगाने की बात कहकर प्रधानमन्त्री ने देश के सामने खुद स्वीकार कर लिया कि इस मामले में उनकी सुरक्षा व्यवस्था फेल हो गयी है। सेना के जरिये वे इसपर लगाम लगाने में नाकामयाब हो गये हैं।
नोटबन्दी का फायदा मिलने के बजाय उससे चैतरफा नुकसान उठाना पड़ा। क्या सरकार अपने मंसूबे में असफल हो गयी। दरअसल ऐसा नहीं है। हाथी के दाँत खाने के कुछ और होते हैं, दिखाने के कुछ और। 8 नवम्बर को सरकार ने नोटबन्दी के पीछे तीन कारण–– जाली नोट, आतंकवाद और काले धन पर कार्रवाई, गिनवाये थे, वे हाथी के दिखाने वाले दाँत थे। जबकि मंसूबा कुछ और ही था। वास्तव में तीन अन्य कारणों से सरकार ने नोटबन्दी का फैसला लिया था, जिसमें वह पूरी तरह सफल रही। वे कारण हैं–– पाँच राज्यों के चुनाव में विपक्षी पार्टियों की घेरेबन्दी, कैशलेस अर्थव्यवस्था से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को फायदा पहुँचाना और पूँजीपतियों के कर्ज को बट््टा खाते में डालना।
आज यह एक खुला रहस्य है कि सभी राजनीतिक पार्टियों के पास अथाह काला धन है। वे इस काले धन का इस्तेमाल कई तरह के गैरकानूनी कामों में करती हैं। इनमें रैली में भीड़ जुटाने के लिए लोगों को 300–400 रुपये देना, चुनाव के समय शराब, मुर्गा और हथियार बाँटना, मीडिया कर्मियों को खरीदकर अपने पक्ष में हवा बनाना और पार्टी विरोधी लोगों का सफाया करने के लिए गुण्डेबदमाशों के गिरोह पालना मुख्य है। प्रधानमन्त्री नोटबन्दी करके इसपर कड़ी चोट करना चाहते थे, लेकिन सिर्फ दूसरी पार्टियों पर। इसीलिए सरकार ने इसका भी पुख्ता इंतजाम कर लिया था कि भाजपा को इस कड़ी चोट से बचा लिया जाये। इस बात के ठोस सबूत जनता के सामने आ गये हैं। भाजपा नेता जनार्दन रेड्डी ने अपनी बेटी की शाही शादी की। इसमें उन्होंने 500 करोड़ रुपये खर्च किये। नोटबन्दी के समय ही भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन गडकारी की बेटी की शादी में 28 चार्टर्ड प्लेन उतारे गये और नागपुर में हुई इस शादी में 10 हजार मेहमान शामिल हुए। जनार्दन रेड्डी और नितिन गडकरी का सरकार बाल भी बाँका नहीं कर पायी। ठीक उसी समय जनता हजारदो हजार के लिए सड़कों पर मारीमारी फिर रही थी। कितने ही घरों से डोली नहीं उठी, कितनों के अरमानों का खून हुआ और कितनों ने अपनी जान गवँा दी। सरकार अपने लोगों और पराये लोगों में खूब अन्तर समझती है।
ऑल इण्डिया मैन्यूफैक्चरर्स ऑर्गेनाइजेशन के एक अध्ययन के मुताबिक नोटबन्दी का सबसे अधिक असर अति लघु और लघु क्षेत्र की उत्पादन इकाइयों पर पड़ा। इस संस्था से 13 हजार उद्योगधन्धे सीधे जुड़े हैं। इस क्षेत्र में 35 प्रतिशत नौकरियाँ खत्म हो गयीं। कुल मिलाकर 12 लाख से अधिक लोग बेरोजगार हुए। इसके बाद बुनियादी सेवा क्षेत्र के 3 से 4 लाख लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया। मझोले उद्योग से 20 से 25 हजार लोग निकाले गये। हालाँकि मझोले उद्योग से निकाले गये लोगों की तादाद बाकी उद्योगों की तुलना में कम है क्योंकि मझोले उद्योग की इकाईयाँ अभी इस उम्मीद में लोगोें की छँटनी नहीं कर रही हैं कि लम्बे समय में हालत सुधर जायेगी।
सूरत के कपड़ा उद्योग में 8 लाख से अधिक लोग काम करते हैं। नोटबन्दी के चलते इनके कारोबार पर गहरा असर पड़ा है। सूरत के  पांडेसरा वीवर्स फेडरेशन के अध्यक्ष आशीष गुजराती ने बताया कि इस सीजन में पूरे भारत में 50 लाख शादियाँ थीें। नोटबन्दी के चलते इनमें से 90 फीसदी शादियों के खर्चे कम करने पड़े। शादी में कपड़े की भारी माँग होती है। नोटबन्दी से लगभग सभी ऑर्डर कैंसिल हो गये।
झारखण्ड में मनरेगा के तहत 26 लााख लोगों के जॉब कार्ड बनाये गये हैं, इनमें से 95 फीसदी को नोटबन्दी के चलते काम नहीं मिल पाया।
लोक लेखा समिति (पैक) ने आरबीआई के गर्वनर और वित्त मन्त्रालय व राजस्व मंत्रालय के अधिकारियों को 20 जनवरी तक पैक के सामने अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहा था। 10 दिसम्बर 2016 के बाद से ही नोटबन्दी को लेकर आरबीआई ने कोई आँकड़ा जारी नहीं किया। पैक ने सवाल पूछा था कि बैंकों के पास कितने पैसे जमा हुए? कितने नये नोट वितरित किये गये? नोट को लेकर मौजूदा संकट कब तक बने रहने की आशंका है? नोटबन्दी के 50 दिन बाद अपने सम्बोधन में प्रधानमन्त्री भी इसका जवाब नहीं दे पाये थे। नोटबन्दी से क्या हासिल हुआ? पैक ने आरबीआई से यह भी सवाल पूछा कि किस कानून और रिजर्व बैंक के प्रावधानों के तहत लोगों पर अपनी ही नकदी निकालने पर रोक लगायी गयी? यह अधिकार आपको किसने दिया? अगर आप कोई नियम नहीं बता सकते तो क्यों न आप पर मुकदमा चलाया जाये और शक्तियों का दुरुपयोग करने के लिए आपको पद से हटा दिया जाये?
योजना आयोग के पूर्व उपाध्याय मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने बताया कि नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर एक से दो प्रतिशत तक गिर सकती है। इस हिसाब से चालू वित्त वर्ष में यह 5 से 5–5 प्रतिशत हो जायेगी। अर्थव्यवस्था में सुस्त रफ्तार की बात राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी स्वीकार की। जनवरी महीने के पहले गुरूवार को देशभर के राज्यपालों और केन्द्र शासित प्रदेशों के उपराज्यपालों को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से सम्बोधित करते हुए कहा कि नोटबन्दी के चलते आर्थिक मन्दी जैसे हालात पैदा हो गये हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पॉलक्रुगमैन ने भी माना कि नोटबन्दी से लम्बे समय में भारतीय अर्थव्यवस्था को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है।
कैशलेस अर्थव्यवस्था और पेटीएम को फायदा पहुँचाने का मामला भी सरकार के गले की फाँस बन गया। जनता में नोटबन्दी विरोधी लहर को महसूस करने के बाद सरकार ने अपना पैंतरा बदल लिया। वह नोटबन्दी को कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर कदम बताने लगी। 8 नवम्बर को नोटबन्दी की घोषणा करते समय प्रधानमन्त्री ने इस बारे में कोई बयान नहीं दिया था। इससे पहले नोटबन्दी की घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर पेटीएम कम्पनी के विज्ञापन में मोदी जी की फोटो छप चुकी थी। उनके ऊपर चीनी कम्पनी पेटीएम के साझीदार अलीबाबा को फायदा पहुँचाने का आरोप भी लगा। इसी दौरान उनपर सहारा और बिड़ला से 50 करोड़ घूस लेने का केस भी सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गया। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने सहारा और बिड़ला के प्रबन्धकों की निजी डायरी में लिखी बातों के आधार पर प्रधानमन्त्री के ऊपर मुकदमा चलाने से इंकार कर दिया। स्पष्ट है कि इस व्यवस्था में सत्ता की कुर्सी पर बैठे किसी व्यक्ति को न्याय के कठघरे में खड़ा करना आसान नहीं।
लगता है कि सरकार का खुद अपनी योजना से ही भरोसा उठ गया था। 30 दिसम्बर तक 500 और 1000 के पुराने नोट बेकार हो जाने थे, जो कुल नोटों का 86 फीसदी थे। यानी लगभग 14,70,000 करोड़ रुपये। अगर कोई काला धन मुद्रा के रूप में बचाकर रखता तो वह रद्दी हो जाना था। मान लिया कि अगर काले धन का एक लाख करोड़ रुपये के पुराने नोट सरकार के पास नहीं पहुँचते तो सरकार उतने ही नये नोट छापकर खजाने में जमा करा सकती थी। इसके बदले में उसे कुछ वापस नहीं करना पड़ता। फिर क्यों सरकार  50–50 की स्कीम लेकर आयी। यानी अपना काला धन सरकार के पास जमा करो और 50 फीसदी सरकार को टैक्स के रूप में देकर बाकी वापस ले जाओ। कहाँ काले धन की कमाई करने वालों की सारी सम्पति जब्त होनी चाहिए थी और उन्हंे जेल की सलाखों में डाला जाना चाहिए था और कहाँ 50–50 का सम्मानपूर्ण ऑफर।
आननफानन में स्वाइप मशीनों की माँग तेजी से बढ़ गयी। रिलायन्स, वालमार्ट आदि के मॉलों में खरीददारी के लिए मध्यम वर्ग की लाइनें लग गयी। इससे एक ओर मध्यम वर्ग ने उत्साहित होकर सरकार की तारीफ में कसीदे पढ़ना शुरू किये तो दूसरी ओर रिलायन्स ने भी घोषणा की कि कम्पनी अगले तीन साल में 300 नये कैश एण्ड कैरी स्टोर खोलेगी। वालमार्ट ने भी लम्बे समय के बाद आगरा में एक नया स्टोर खोल दिया और अगले तीन सालों में 50 नये स्टोर खोलने की तैयारी में जुट गयी है।
एसबीसी ग्लोबल रिसर्च के अनुसार नोटबन्दी से पैदा हुई दिक्कतें स्थायी रहंेगी। उसने तीसरी और चैथी तिमाही की अनुमानित वृद्धि दर घटाकर 5–5 प्रतिशत कर दिया है। कोटक इंस्टीटयूशनल इक्वीटीज ने भी वृद्वि दर में गिरावट का संकेत दिया है।
ग्रामीण इलाकों में अधिक प्रभाव पड़ने की सम्भावना है। भारत गाँवों का देश है। यहाँ 60 प्रतिशत से अधिक लोग गाँवों में रहते हैं। नोटबन्दी से सब्जी किसानांे की कमर टूट गयी। नोट की कमी के चलते ठेलेखोमचे पर सब्जी बेचने वालों का धन्धा चैपट हो गया। इससे शहरों में सब्जी की माँग गिर गयी और कीमतें भी टूट गयी। सब्जी किसानों को भरी नुकसान  हुआ। नोट की कमी के चलते समय से खेतों की जुताई नहीं हो पायी। रबी की फसल का रकबा घट गया। इस बार किसानांे को धान कौड़ियों के मोल बेचना पड़ा। इससे धान उगाने वाले किसान बर्बाद हो गये। वे बैंकों और सूदखोरों के कर्जे के नीचे दब गये। किसान आत्महत्याओं की संख्या में भी तेज वृद्धि हुई है।
सभी क्षेत्रों में कारोबार मन्दा होने के चलते ट्रांसपोर्ट का धन्धा भी ठहराव का शिकार हो गया। सड़कों पर खड़े ट्रकों की लम्बी कतारें लग गयीं। महिलाओं ने अपने घर वालों से छिपाकर भविष्य के लिए जो थोड़ेबहुत रुपये बचा कर रखे थे, उससे भी हाथ धोना पड़ा। कई जगहों पर इसी मुद्दे को लेकर पतिपत्नी में मारपीट की भी नौबत आ गयी। पारिवारिक तानेबाने को छिन्नभिन्न करनेवाली इन घटनाओं पर बेदिल शासकों की निगाह नहीं जाती। इन समस्याओं के बारे में सरकार का दावा था कि ये तात्कालिक समस्याएँ हैं, लम्बे समय में हालात ठीक हो जायेंगे। इस बात पर संसद में पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि हमें बस इतना पता है कि लम्बे समय में सभी मर जायेंगे। उन्होंने नोटबन्दी को सरकार की संगठित लूट बताया।
वर्गीय समाज में कोई भी नीति देश के सभी लोगों को समान रूप से प्रभावित नहीं करती। किसी भी सरकारी नीति का अलगअलग पायदान पर खड़े वर्गों पर अलगअलग प्रभाव पड़ना लाजमी है। नोटबन्दी ने भी जहाँ एक ओर मेहनतकश जनता को रुलाया तो दूसरी ओर पूँजीपतियों की पाँचों ऊँगलियाँ घी में डूब गयीं। वे खुशी से फूले न समाये। उन्हें सबसे बड़ा फायदा दो रूपों में मिलता दिखाई दिया। पहला, बैकों से देश के जिन 63 बड़े पूँजीपतियों ने लाखों करोड़ रुपये कर्ज लिया था और वे कर्ज वापस नहीं कर रहे थे, जिससे लगभग सभी बैंक दिवालियेपन के कगार पर पहुँच गये थे। नोटबन्दी से बैंकों में अकूत धन जमा हुआ जिससे तात्कालिक तौर पर बैंकों की बर्बादी टल गयी और सरकार ने इन हरामखोरों के कर्जों को बट्टा खाते में डाल दिया। आजादी के बाद से आज तक बट्टा खाते में डाला गया केवल 11 फीसदी कर्ज ही वसूला जा सका है। इसे देखते हुए सरकार का यह कदम पूँजीपतियों के लिए कर्जमाफी से कम नहीं है। यह सब नोटबन्दी की कतार में लगे लोगोें की लाश पर किया गया। नोटबन्दी से कुछ महीने पहले प्रशासन को फटकार लगाते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि बैंककर्मी 50 हजार रुपये का कर्ज वसूलने के लिए किसानों को प्रताड़ित करते हैं, लेकिन पूँजीपतियों के करोड़ों के कर्जों पर कोई कार्रवाई नहीं करते। अमीरों के ऊपर कोई भी कानून लागू नहीं हो पाता। यह ऐसा ही देश है। नोटबन्दी ने एक बार फिर इस सच्चाई पर मुहर लगा दी।
दूसरा, छोटे दुकानदारों की परेशानी बढ़ गयी। नकदी में कमी के चलते उनकी बिक्री में भारी गिरावट हुई। इसी दौरान शॉपिंग मॉल और खुदरा की बड़ी दुकानों में बिक्री बढ़ गयी। क्योंकि वहाँ पहले से ही स्वाइप मशीनें काम कर रही थीं। जब छोटे दुकानदार और कारोबारी बर्बाद हो जायेंगे, तो जाहिर है कि बड़े पूँजीपति उनका धंधा हथिया लेंगे। वालमार्ट और रिलायंस छोटे दुकानदारों को बाजार से बेदखल करने की हैसियत रखते हैं। वहीं छोटे कारखानेदारों और कारोबारियों के उजड़ने के चलते बड़े पूँजीपति उनका बाजार हथिया लेंगे। नोटबन्दी ने पूँजीवादी व्यवस्था के अन्दर छोटे कारखानेदारों के उजड़ने की स्वाभाविक गति को तेज कर दिया है। यही हाल गरीब और मध्यम किसानों का है। इन किसानों के लिए पहले ही खेती घाटे का सौदा थी, नोटबन्दी ने उनके ऊपर दोहरी मार की है। इनकी तुलना में नोटबन्दी की मार से धनी किसान बच निकले। रसूखदार धनी किसानों ने बैंको से मिलीभगत करके खुद के लिए नये नोटों का पुख्ता इंतजाम कर लिया था। ऐसे ही लोग यह भी कहते पाये गये कि नोटबन्दी से हमें कोई नुकसान नहीं है। मोदी जी का फैसला बिल्कुल ठीक है।
यह बात पल्ले नहीं पड़ती कि सरकार ने 94 प्रतिशत कालेधन को छोड़कर 6 प्रतिशत काले धन पर कार्रवाई के लिए नोटबन्दी क्यों की है? दरअसल भाजपा सरकार 1 अप्रैल 2017 से जीएसटी लागू करने जा रही है, वाइब्रेंट गुजरात सम्मलेन में वित्तमंत्री ने जीएसटी, कैशलेस अर्थव्यवस्था और नोटबन्दी के बीच सम्बन्धों के बारे में बात की। अगर सरकार कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने में पूरी तरह सफल भी नहीं होती तो भी नोटबन्दी के बाद तबाह होने से बच गये छोटेबड़े सभी दुकानदारों के मन में यह खौफ भर देगी कि स्वाइप मशीन के बिना व्यापार जोखिम भरा है, तो दुकानदार और कारोबारी स्वाइप मशीन से कैशलेस व्यापार शुरु कर देंगे। इसके बाद सरकार आसानी से केन्द्रीय नियंत्रण के जरिये जीएसटी लागू करने में सफल हो जायेगी। वह टैक्स की दर भी मनमाने तरीके से तय करेगी। उसकी योजना है कि शुरू में 10 प्रतिशत टैक्स लिया जाये लेकिन ऐसी सम्भावना है कि जल्द ही वह इसे बढ़ाकर 28 प्रतिशत कर देगी। छोटे दुकानदार अपने व्यापार में शायद ही तिहाई लाभांश कमा पाते हों। ऐसी हालत में 28 प्रतिशत टैक्स से उनकी कमर टूट जायेगी।
18 नवम्बर को पूर्व वित्तमन्त्री पी चिदम्बरम ने कहा कि सबूत दिखाते हैं कि सरकार का यह फैसला ठीक नहीं था जो खराब तरीके से लागू हुआ हो जैसा कि कुछ लोग इसे बताने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि यह सरकार का गलत फैसला था जिसे गलत तरीके से लागू किया गया। वर्गीय नजरिया रखने वाला इंसान पी चिदम्बरम की बात से सहमत नहीं हो सकता। अगर यह पूरी तरह गलत फैसला था तो पूँजीपति वर्ग, मीडिया और मध्यम वर्ग का ऊपरी तबका सरकार के इस फैसले के साथ क्यों खड़ा था? सच बात तो यह है कि इन लोगों को ध्यान में रखकर ही सरकार ने यह फैसला लिया था और इन लोगों का इससे बहुत फायदा हुआ है।
सामीर अमीन ने अपनी पुस्तक उदारवादी वायरसमें लिखा है कि दुनिया की आधी आबादी यानी लगभग 350 करोड़ लोग अर्थव्यवस्था के हाशिये पर फेंक दिये गये हैैं। वे न तो उत्पादक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और न ही उनकी क्रयशक्ति इतनी है कि वे बाजार का हिस्सा बनकर माँग को बढ़ा सकें। पूँजीवादी अर्थशास्त्री और सरकारंे उन्हंे फालतू आबादी मानती हैं और उनसे छुटकारा पाना चाहती हैं। सोचिए यह कितनी विध्वंशक बात है! आप दुनिया की आधी जनता को खत्म करने की बात सोचते है? उच्च वर्ग को कोई परवाह नहीं कि देश के मजदूर और किसान खत्म होते जा रहे हैं। वे इसे फालतू आबादी मानकर इनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। भारत में बेहद कंगाली में जिन्दगी गुजारनेवाले लोग आधी आबादी से अधिक हैं। पूँजीपति वर्ग के उद्योगों के लिए मजदूरों की लम्बी कतारें लगीं हुई हैं बल्कि वे उद्योगों से मजदूरों की छँटनी कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें मेहनतकश जनता की फिक्र करने की क्या जरूरत है। नोटबन्दी के साथसाथ सरकार और व्यवस्था का हर कदम जनता की तकलीफें बढ़ाने वाला है और उसे मौत की ओर धकेलने वाला। भाजपा सहित तमाम राजनीतिक पार्टियों की सोच केवल इतनी है कि यही आबादी उसे चुनावों में वोट देकर विजयी बनाती है। वे उसे नाराज नहीं करना चाहते। हालाँकि नोटबन्दी से भाजपा को जनता की जबरदस्त नाराजगी झेेलनी पड़ी लेकिन वह सोचती है कि मीडिया के जरिये जनता को गुमराह करके बाजी मार लेगी। इस तरह वह अपने मंसूबे में कामयाब हो जायेगी।
भारत के सत्ता पक्ष, विपक्ष और दुनिया भर के तमाम बुर्जुआ अर्थशास्त्री इस मुद्दे पर एकदूसरे से मतभेद रखते हैं। उनके मतभेद का लब्बोलुआब यह है कि जनता की दुखतकलीफों से उनका कोई सरोकार नहीं है। उनका मतभेद इस बात को लेकर है कि नोटबन्दी से अर्थव्यवस्था पर कितना घातक प्रभाव पड़ेगा? पूँजीपति वर्ग के मुनाफे मेंं कितनी कमी होगी? अमर्त्य सेन, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, मनमोहन सिंह और पॉल क्रुगमैन मानते हैं कि दूरगामी तौर पर इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ जायेगी। वे नोटबन्दी को अर्थव्यवस्था के लिए उतना ही बड़ा खतरा मान रहे हैं जितना बड़ा खतरा तब पैदा हो जाता है, जब किसी इंसान के शरीर से खून निकालने के बाद उसी रफतार से नया खून वापस न चढ़ाया जाये। वे खून चढ़ाने में लापरवाही को लेकर डॉक्टर की आलोचना करते हैं। लेकिन वे डॉक्टर को इसलिए नहीं लताड़ते कि खून निकालने की जरूरत ही नहीं थी, फिर भी उसने खून क्यों निकाल लिया। सरकार के पक्षधर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि नोटबन्दी ब्लड कैंसर से पीड़ित इंसान के शरीर से गन्दा खून निकालने जैसा था। लेकिन सच्चाई यह है कि केवल 6 प्रतिशत काला धन ही नकदी के रूप में था, जिसके लिए इतनी तबाही मचायी गयी। बाकी के 94 प्रतिशत काले धन पर सरकार चुप क्यों है?
सरकार ने कैशलेस अर्थव्यवस्थाका एक बेहद मनमोहक नारा उछाला है। इसे पूँजीपति वर्ग ने हाथोहाथ लपक लिया। नोटबन्दी से सीधेसीधे मोबाइल एप्प और सॉफटवेयर कम्पनियों को फायदा पहुँचाया गया। ईमार्केटिंग कम्पनी अमेजन की बिक्री अचानक कई गुना बढ़ गयी। सीधी सी बात है कि अमेजन, स्नैपडील और फिलपकार्ट को बढ़ावा देना छोटे दुकानदारों के हितों पर सीधा हमला है। यह कोई मुक्त प्रतियोगिता नहीं है, बल्कि सरकार ने छोटे दुकानदारों पर नोटबन्दी का जो बेरहम चाबुक चलाया है, दुकानदारों की दुर्दशा उसी का नतीजा है।
गाँवों में अधिकांश जनता के पास बैंक खाते नहीं है। नोटबन्दी के चलते उन्हें अथाह मुश्किलों का सामना करना पड़ा। गाँवों में बैंक दूरदूर हैं और पहाड़ी गाँवों में तो बैंक इतनी दूर होते है कि आनेजाने में पूरा दिन लग जाता है। गाँव की अर्धशिक्षित और अशिक्षित जनता को बैंकों का कई बार चक्कर काटना बहुत बड़ी परेशानी का सबब बन गया। भारत की लगभग आधी जनता अशिक्षित या अर्धशिक्षित है। इसके लिए कैशलेस अर्थव्यवस्था की बात बेहूदा मजाक से कम नहीं है।
कोई भी चुनावी पार्टी जनता के साथ खड़ी नहीं है। सभी पार्टियाँ जनता को भ्रमित करके उनकी सस्ती सहानुभूति हासिल करना चाहती हैं। आज सभी पार्टियों ने उदारीकरण और वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों के आगे समर्पण कर दिया है। ये विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमरीका की नीतियों को बढ़चढ़ कर लागू करती हैं। इसीलिए इन पार्टियों की आर्थिक नीतियों में कोई अन्तर नहीं है। इन्होंने अपने देश की जनता का दामन छोड़कर बेशर्मी से विदेशी पूँजी का दामन थाम लिया है। एक साल पहले अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने दुनिया भर की सरकारों को कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने का निर्देश दिया था, जिससे वालमार्ट जैसी दिग्गज खुदरा और अमेजन जैसी ईमार्केटिंग कम्पनियों के लिए बाजार तैयार किया जा सके। यह बाजार तभी तैयार हो सकता था, जब छोटे दुकानदारोंं को बाजार से बाहर ढकेल दिया जाता। झूठफरेब करके सरकार ने अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की इसी नीति को लागू किया है। वेनेजुएला की सरकार ने जब नोटबन्दी लागू की तो जनता के जबरदस्त विरोध के चलते उसने कदम वापस ले लिया। लेकिन भारत में देशीविदेशी कम्पनियों की लूट जारी है। इस मुद्दे पर पक्षविपक्ष की सभी पार्टियों ने चुप्पी साध रखी है। विपक्ष की पार्टियाँ संसद और सड़कों पर विरोध का दिखावा करती हैं। वे जनता को कभी जन पक्षधर मुद्दों पर गोलबन्द नहीं करतीं। नोटबन्दी के मामले में विपक्षी पार्टियों की सरकार के साथ घिनौनी समझौतेबाजी के चलते ही जनता अधिक गुमराह रही। दरअसल चुनावी राजनीति में विपक्ष जैसी चीज खत्म हो गयी है। सभी पार्टियाँ व्यवस्था की पोषक हैं। वे आपस में मिलकर जनता को लूटती हैं। वामपंथी पार्टियाँ भी संसदवाद के कीचड़ में धँस गयी हैं और व्यवस्था की पार्टी बन चुकी हैं। वे भी जनसंघर्षों में भागीदारी नहीं करतीं। उनके पास भी जनता को देने के लिए कुछ नहीं है।
कुछ लोग ऐसा मान रहे हैं कि सरकार ने नोटबन्दी का फैसला लागू करने से पहले पर्याप्त तैयारी नहीं की, इसीलिए जनता को आर्थिक परेशानी उठानी पड़ी। दरअसल सरकार ने यह फैसला अपनी पूरी समझदारी के साथ लागू किया था, जितनी समझदारी उसके पास थी। राजनीतिक पार्टियों के अपने बुद्धिजीवी होते हैं जो पूँजीपति वर्ग के स्वार्थों के अनुरूप नीतियाँ बनाते हैं। ये जनता से पूरी तरह से कटे होते हैं, इसीलिए जनता के ऊपर सरकारी नीतियाँ बड़ी बेरहमी से थोपते हैं।
नोटबन्दी से विपक्ष की पार्टियाँ सचमुच बौखला गयी थीं, दूसरी ओर सत्ता पक्ष की पार्टियों में कोई खलबली नहीं हुई। हालाँकि भाजपा भी भ्रष्टाचार मुक्त पार्टी नहीं है। यदुरप्पा, वसुंधरा राजे, रमन सिंह, शिवराज सिंह चैहान, अरुण जेटली और अन्य भाजपा नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं, लेकिन नोटबन्दी से उन्हें डर नहीं लगा। वे आश्वस्त थे कि उनका कालधन सुरक्षित है। लेकिन विपक्षी पार्टियाँ सकते में आ गयी थीं। उन्हें लगा कि कहीं मोदी सचमुच उनपर हमला न कर दे। इसके चलते उन्हांेने सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया। घेराव, आन्दोलन, और प्रदर्शन की रणनीति कामयाब हुई। सरकार ने विपक्षी नेताओं से बैठक करके उन्हें भरोसा दिया कि किसी भी राजनीतिक पार्टी के आर्थिक स्रोत पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।
भारत के असंगठित क्षेत्र में श्रमशक्ति का कुल 93 फीसदी लगा हुआ है। खेत मजदूर, ठेका मजदूर, हथकरघे आदि का कारोबार करने वाले लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। 80–90 प्रतिशत कर्मचारियों को कैश में भुगतान किया जाता है। नोटबन्दी के चलते इस क्षेत्र के अधिकांश मजदूर बेरोजगार हो गये। इन्होंने लाखों की संख्या में महानगरों को छोड़कर उलटा गाँवों की ओर पलायन किया। पुराने नोट बदलवाने के लिए भी मजदूरों को दिनदिन भर लाइन में लगे रहना पड़ा। ऐसी स्थिति में उनके कामधन्धे टूट गये।
पूरे देश में कोयला खदान की कई इकाइयाँ बन्दी के कगार पर हैं। 70 प्रतिशत मजदूरों की छँटनी कर दी गयी है। अपने गाँव लौटे मजदूरों की भारी संख्या के चलते दिसम्बर में मनरेगा के तहत नौकरी माँगने वालों की संख्या 60 प्रतिशत बढ़ गयी। पूरे देश में दिसम्बर में लगभग 840 लाख लोग मनरेगा के तहत नौकरी माँग रहे थे।
सितम्बर 2016 तक भारतीय बैंकिंग व्यवस्था दिवालिया होने के कगार पर पहुँच गयी थी। पूँजीपतियों ने बैंकों का कर्ज लौटना बन्द कर दिया। कुल मिलकर 6 से 7–5 लाख करोड़ पूँजीपतियों पर बकाया था। नोटबन्दी के चलते बैंकों में बड़ी संख्या में नकदी जमा हो गयी। जिसे लोग नये नोटों के रूप में एक साथ निकाल नहीं सकते हैं क्योंकि इसपर सरकार ने रोक लगा दी है। नकदी जमा होने के चलते बैंकों का कर्ज संकट तात्कालिक तौर पर हल हो गया।
केवल 6 प्रतिशत कालाधन मुद्रा के रूप में है। इसे हासिल करने के लिए सरकार ने नोटबन्दी लागू नहीं की है। उसका असली मकसद देश की अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाना था। लेकिन वह इसे घोषित तौर पर लागू करने से डरती थी।

इस तरह नोटबन्दी के चलते सरकार की तीनों मंशा पूरी होती नजर आ रही हैं। चाहे वह 2017 में पाँच राज्यों के चुनाव में विपक्षी पार्टियों को पटखनी देने का मामला हो या पूँजीपतियों की कर्जमाफी और कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने का मामला हो। हालाँकि नोटबन्दी  के चलते भाजपा सरकार को भी कम मुश्किलें झेलनी नहीं पड़ रही हैं। पार्टी के सांसदों, विधायकों और नेताओं को जनता के जबर्दस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें दौड़ादौड़ा कर पीटा जा रहा है और रस्सी से बाँधा जा रहा है। लेकिन यह देश की व्यापक जनता की अथाह पीड़ा के आगे कुछ भी नहीं जिससे बैंक में रुपये होते हुए भी अपने लोगों को हमेशा के लिए खो देना पड़ा। आजादी के बाद से आनेवाली सरकारों ने जनता के ऊपर एक से बढ़कर एक कुठाराघात किया, लेकिन इस सरकार ने जितनी कुटिलता के साथ कुचाल चली है, उसका उदाहरण इतिहास में दुर्लभ है।

--विक्रम प्रताप

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

‘अमूर्त श्रम’ और ‘मूर्त श्रम’

कार्ल मार्क्स ने अपनी रचना ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना’ में अमूर्त श्रम और मूर्त श्रम के सम्बन्ध में अपनी राय रखी है. उन्होंने यहीं पर दोनों में अंतर भी स्पष्ट किया है। उनके हिसाब से अमूर्त श्रम आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण सामान्य श्रम-काल से सम्बन्ध रखता है और मूर्त श्रम किसी ख़ास कार्रवाई के रूप में ‘मानव श्रम’ से सम्बन्ध रखता है, ‘मानव श्रम’ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जिसका विशेष उपयोगी प्रभाव होता हो।
आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण श्रम-काल के रूप में, मानव श्रम’ उत्पादों या परिसंपत्तियों की मूल्य वृद्धि में खर्च किया जाता है (जिससे उत्पादों के पूँजीगत मूल्य को संरक्षित किया जाता है और/या लागत से पैदावार तक मूल्य का हस्तांतरण होता है)। इस अर्थ में, श्रम एक ऐसी गतिविधि है जो आर्थिक मूल्य को शुद्ध और सरल रूप में उत्पन्न करती है या कायम करती है, जिसकी पैसे के रूप में वसूली तभी सम्भव है जब उस उत्पाद की बिक्री होती है और उसे कोई खरीदार हासिल कर लेता है। श्रम की मूल्य-निर्माण क्षमता को सबसे स्पष्ट रूप से दिखलाने का तरीका है-- सभी श्रम को बंद कर देना। अगर सभी श्रम रोक दिया जाए, तो जिस पूँजीगत संपत्ति के साथ काम किया जाता है उसका मूल्य आम तौर पर ख़तम हो जायेगा और अंत में, अगर श्रम को स्थायी रूप से रोक दिया जाए, तो शहर भुतहा खंडहर में बदल जाएगा।
अब हमें ‘मानव श्रम’ के बारे में इस तरह विचार करना चाहिए, जैसे वह एक विशेष प्रकार की उपयोगी गतिविधि हो. जैसे—‘मानव श्रम’ का इस्तेमाल इस तरह करना होगा कि वह कोई ख़ास उत्पाद पैदा करने के काम आये, जिसका उपयोग दूसरे लोगों या खुद उत्पादकों द्वारा किया जा सके. वह उत्पाद वास्तविक होना चाहिए, न कि काल्पनिक. इस अर्थ में, श्रम एक ऐसी गतिविधि है जो उपयोग-मूल्य उत्पन्न करती है, यानी वास्तविक उत्पाद में ऐसा परिणाम या प्रभाव पैदा करती है जो इस्तेमाल किये जाने लायक हो या उपभोग में लाये जाने लायक हो। उपयोग-मूल्य के सृजन का महत्त्व तब उभरकर सामने आ जाता है, जब खराब गुणवत्ता की वस्तुओं और सेवाओं का निर्माण होता है या जिनकी समय पर आपूर्ति नहीं होती है और जो उपभोक्ता के लिए किसी काम के नहीं होते है। श्रम का इस्तेमाल उपयोगी उत्पादों का निर्माण करने के लिए होना चाहिए, भले ही उनको किसी भी कीमत पर बेचा जाये, नहीं तो उनका कोई उपयोग-मूल्य नहीं होगा. अगर श्रम से बेकार उत्पाद या नतीजे सामने आते हैं, तो यह महज श्रम-काल की बर्बादी है।
इसलिए, मार्क्स का तर्क है कि इन्सान की मेहनत (1) एक ऐसी गतिविधि है, जो अपने उपयोगी प्रभाव के जरिये खास तरह के उत्पादों को पैदा करने में मदद करती है और (2) आर्थिक मायने में यह एक मूल्य-निर्माण की गतिविधि भी है, जिसे यदि उत्पादक कार्रवाई के रूप में लिया जाए, तो शुरूआती लागत सामग्री की तुलना में अधिक मूल्य निर्माण करने में सहायक हो सकती है। यदि कोई नियोक्ता श्रम को भाड़े पर रखता है, तो वह इन दो बातों पर गौर करता ही है— पहला, उसके व्यापार में क्या उस श्रम के द्वारा मूल्य योगदान हो सकता है और दूसरा, श्रम सेवा उसके व्यापार परिचालन के लिए कितनी उपयोगी होगी? यानी, न केवल सही तरह के काम का पूरा होना जरूरी है, बल्कि उसका इस तरीके से पूरा होना जरूरी है जिससे वह नियोक्ता को पैसा बनाने में मदद करे। यदि श्रम कोई मूल्य योगदान नहीं करता है, तो नियोक्ता इससे पैसा नहीं कमा सकता और तब श्रम केवल उसके लिए एक फ़ालतू का खर्चा होगा।
"एक तरफ सभी श्रम, यदि शारीरिक रूप से देखा जाये, तो मानव श्रम शक्ति खर्च है, और एकरूप अमूर्त मानव श्रम के अपने चरित्र की वजह से, यह माल के मूल्य को उत्पन्न और निर्मित करता है। दूसरी ओर, सभी तरह का श्रम एक विशेष रूप में और एक निश्चित उद्देश्य के साथ, मानव शक्ति का खर्च है और इसमें, मूर्त उपयोगी श्रम के अपने चरित्र के चलते, वह उपयोग मूल्य पैदा करता है। ...पहली नजर में कोई माल खुद को हमारे सामने दो चीजों की जटिलता के रूप में प्रस्तुत करता है-- उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य। बाद में, हमने यह भी देखा कि श्रम की भी वैसी ही दोहरी प्रकृति होती है; क्योंकि जहाँ तक इसके मूल्य में अभिव्यक्ति पाने की बात है, उसके पास केवल वही चारित्रिक विशेषता नहीं होती जो इसके उपयोग मूल्य उत्पन्न करने के साथ जुड़ी होती है। मैंने पहली बार मालों में निहित श्रम की इस दोहरी प्रकृति की ओर ध्यान आकर्षित किया और ­उसकी आलोचनात्मक जाँच-पड़ताल की।... यह मुद्दा एक ऐसी बुनियाद है जिस पर राजनीतिक अर्थशास्त्र की स्पष्ट समझ टिकी है।" – कार्ल मार्क्स

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

देश विदेश-26




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इसके मुख्य लेख--
  • मोदी सरकार के तीन साल 
  • सहारनपुर में जातीय हिंसा और उसके निहितार्थ
  • नरमुंड में तब्दील होते तमिलनाडु के किसान 
  • सीमाहीन अन्याय
  • भारत से दूर होता कश्मीर
  • मीडिया : आजादी और जवाबदेही 
  • बेरोजगारी बढ़ाओ, देश को महाशक्ति बनाओ असली देशभक्त कहलाओ
  • जॉन गाल्सवर्दी की कहानी 'जिन्दगी और कानून'
  • इब्ने इंशा  की कहानी 'चीन में औरतें नहीं होती '
  • सिलिकॉन वैली में मई दिवस
  • बस एक बार नौकरी पक्की हो जाने दो!
  • खोखले बैंक और आर्थिक महाशक्ति का सपना
  • बन बैल्ट, वन रोड परियोजना :अमरीका पर निर्णायक बढ़त लेने की चीनी कोशिश
  • हम वोट डालें या राजनीति को फिर से गढ़ें ?



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देश विदेश-2,5,7,8,9,11,12,13,14,15,16