मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

गुजरात- गरीबी के पारावार में विकास की मीनार (भाग 1)

झूठ के सिर-पैर नहीं 
2014 में लोकसभा चुनाव होना है। इसकी तैयारी जोरों पर है। ऐसा लग रहा है जैसे चुनावी दंगल में भाजपा के पहलवान के मुकाबले कांग्रेस का पिद्दी खड़ा है। धुँआधार प्रचार का कमाल है कि आज नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व नौजवानों को खूब लुभा रहा है। वे गुजराती और हिन्दी में अच्छा भाषण दे लेते हैं। 2011 में अपनेवाइब्रेंट गुजरातसम्मलेन में उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धियाँ गिनाते हुए कहा था कि विकास के मामले में गुजरात कितना आगे है, इसका प्रमाण यह है कि यूरोप में भिन्डी की आपूर्ति गुजरात से होती है, सिंगापुर में दूध गुजरात से जाता है, 6 लाख जल संचय के उपाय किये गये हैं, पूरे देश में जल स्तर नीचे जा रहा है जबकि अकेले गुजरात में ऊपर जा रहा है। लेकिन लगता है सच्चाई देवी उनसे खफा है क्योंकि देश में भिन्डी के उत्पादन और निर्यात के मामले में गुजरात नहीं, बल्कि आँध्रप्रदेश अग्रणी है। दूध के उत्पादन में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है जबकि गुजरात चैथे स्थान पर है। पिछले साल गुजरात काकपास का टोकराराजकोट जब भयंकर सूखे से जूझ रहा था, तो सिंचाई के वैकल्पिक साधन की व्यवस्था नहीं की गयी। लिज्जत पापड़ की शुरुआत कुछ महिलाओं ने 1959 में की थी और उनकी संस्थासेवामोदी की आँखों में चुभती रही है। लेकिन अब मोदी खुद ही उनकी उपलब्धियों का श्रेय लेकर अपनी पीठ थपथपाते फिर रहे हैं। बेरोजगारी का आलम यह है कि (एनएसएसओ) की एक रिपोर्ट के अनुसारपिछले 12 सालों में यहाँ रोजगार वृद्धि दर शून्य के करीब पहुँच चुकी है। एक सवाल सहज ही जेहन में आता है कि अगर वहाँ बेरोजगारी की समस्या हल कर ली गयी है, तो देश से बेरोजगारों का बहाव गुजरात की ओर क्यों नहीं हो रहा है?
पूँजीपतियों के चहेते 
सच्चाई यह है कि गुजरात निजी कम्पनियों का अभयारण्य बना हुआ है। टाटा ने पश्चिम बंगाल के सिंगूर से खदेड़े जाने के बाद नैनो कार का अपना प्लांट गुजरात स्थानान्तरित कर लिया। टाटा ने वहाँ 2200 करोड़ का निवेश किया, जबकि 5970 करोड़ का कर्ज गुजरात सरकार ने 0.1 फीसदी ब्याज पर दिया। 10000 रुपये वर्ग मीटर की जमीन 900 रुपये के भाव में दी और वह भी कृषि विश्वविदयालय की जमीन हड़प कर। इसके अलावा बिजली, पानी, सड़क सब कुछ सस्ते दरों पर मुहैया किया गया। मोदी की कृपा बरसने के बाद अब टाटा कम्पनी बड़ी संख्या में कारों के उत्पादन में लगी हुई है। इसी तरह गौतम अदानी की कम्पनी, अमरीकी गैस कम्पनी, जियो और अन्य कम्पनियाँ भले ही गुजरात में फलफूल रही हैं, लेकिन विकास की इस तेज आँधी का असर जनता की जिन्दगी पर दिखायी नहीं देता।
गरीब बच्चों की शिक्षा में फिसड्डी 
गुजरात सरकार ने गरीब छात्रों को शिक्षा देने से हाथ खड़े कर दिये हैं। उसने मई 2012 में उच्च न्यायालय को कहा कि सामाजिकआर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के छात्रों की प्राथमिक शिक्षा के लिए उसके पास पर्याप्त पैसा नहीं है। गुजरात सरकार का 2013–14 का बजट 1.14 लाख करोड़ का है, लेकिन उसके पास गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए पैसा नहीं है। दूसरी ओर 2011 के एक आदेश में सरकार ने निजी शिक्षा संस्थानों को प्रवेश प्रक्रिया और मनमानी फीस वसूलने की खुली छूट दे दी है। गुजरात के सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1999–2000 में सरकारी स्कूलों में 81.34 लाख बच्चे पढ़ते थे। 2011–12 में उनकी संख्या घटकर 60.32 लाख रह गयी। बाकी गरीब बच्चों को पढ़ाई छोड़ने या मध्यवर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में प्रवेश के लिए बाध्य कर दिया गया, जहाँ उनके अभिभावकों को ऊँची फीस भरनी पड़ती है। 2003 में 16.80 लाख बच्चों ने पहली कक्षा में प्रवेश लिया था जबकि 2013 तक दसवीं कक्षा में मात्र 10.30 लाख बच्चे रह गये। इस तरह बच्चों को स्कूल में रोके रखने की दर के मामले में देशभर में गुजरात का 18वाँ स्थान है। प्राथमिक विद्यालयों की उपेक्षा का आलम यह है कि जहाँ 2005–06 में अहमदाबाद नगर निगम के पास 541 प्राथमिक विद्यालय थे, वहाँ 2011–12 में घटकर 464 रह गये। शिक्षकों की कमी और खराब होता ढाँचा सरकारी विद्यालयों की पहचान बन गयी है ये आँकड़े खुद गुजरात सरकार ने दिये हैं। निजी शिक्षा इतनी महँगी हो गयी है कि आम आदमी के बच्चे उसमें पढ़ नहीं सकते।
गुजरात के बच्चे सिर्फ शिक्षा से वंचित हैं, इतना ही नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि वे पोष्टिक भोजन पा रहे हैं और उनका स्वास्थ्य ठीक है। आँकड़े बताते है कि गुजरात में खून की कमी (अनीमिया) से पीड़ित बच्चों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है 1998–99 में यह अनुपात 74.5 प्रतिशत था जो 2005–06 में 80.1 प्रतिशत हो गया। इसी अवधि में एनीमिया से पीड़ित गर्भवती महिलाओं की संख्या 47.4 प्रतिशत से बढ़कर 60.6 प्रतिशत हो गयी। बाल विकास सेवा योजना के बारे में कैग की रिपोर्ट में दी गयी जानकारी चैंकाने वाली है। जिन आठ राज्यों में एक लाख से अधिक बच्चे गम्भीर कुपोषण के शिकार हैं, उनमें गुजरात भी शामिल है। बच्चों में मृत्युदर के मामले में भी गुजरात अगली कतार में है। वहाँ 2005–06 में 51,300 लोगों पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र था, लेकिन 2011–12 में घटकर 56,100 लोगों पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र रह गये हैं।
महिलायें हाशिए पर 
हिन्दू संस्कृति में महिलाओं को देवी के समान माना गया है। भाजपा ने बारबार महिलाओं की दशा सुधारने का आश्वासन भी दिया। लेकिन वहाँ की हकीकत उनके इरादों की चुगली कर ही देती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2006–07 में दो लाख से अधिक महिलाओं को राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना का फायदा मिलना था, लेकिन उनमें से केवल 42,373 महिलाओं को ही यह लाभ दिया गया जो केवल 20 प्रतिशत है। इस मामले में देश भर में गुजरात का 17वाँ स्थान है। ग्यारवीं पंचवर्षीय योजना में अनुसूचित जाति के बच्चों और छात्रों के विकास के लिए 29 परियोजनाओं को लागू किया जाना था, लेकिन 18 परियोजनाओं में अनुमान से बहुत कम खर्च किया गया। हमारे देश में बुजुर्गों की सेवा करना धर्म माना जाता है, लेकिन गुजरात इस मामले में भी फिसड्डी साबित हुआ। 2006–07 में 3.29 लाख लोगों को राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना का लाभ मिलना चाहिए था लेकिन गुजरात सरकार ने केवल 40,117 बुजुर्गों को ही पेंशन दी, जो कुल संख्या का सिर्फ 12.2 प्रतिशत है, यानी 87.8 प्रतिशत बुजुर्गों को इससे वंचित रखा गया।