बुधवार, 11 दिसंबर 2013

गुजरात- गरीबी के पारावार में विकास की मीनार (भाग 2)

किसानों की दुर्दशा 
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ 65 प्रतिशत से अधिक आबादी खेती पर निर्भर है। केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने अपनी नीतियों के जरिये देश भर के किसानों को बरबादी के कगार पर ला दिया हैलेकिन गुजरात भी इसमें पीछे नहीं है। सन 2000 – 06 के दौरान सिंचाई परियोजनाओं के लिए 10,158 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गयाजिसके चलते 15,731 किसान परिवार प्रभावित हुए और उन्हें प्रति एकड़ 22,611 रुपये मुआवजा दिया गया। इसी समय उद्योग के लिए किसानों की 3006 हेक्टयेर भूमि का अधिग्रहण किया गयाजिससे 424 परिवार प्रभावित हुए और उन्हें प्रति एकड़ 15,873 रुपये मुआवजा मिला। यह 1991–2000 के दौरान मिले मुआवजे से बहुत कम है क्योंकि उस समय उद्योग के लिए जिस 5,626 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण करके 2888 परिवारों को विस्थापित किया गया थालेकिन उन्हें साधे तीन गुना से भी अधिक प्रति एकड़ 59,294 रुपये मुआवजा दिया गया था। अपनी खेती से उजड़ चुके किसान बेरोजगार होकर इधरउधर भटकने पर मजबूर हैं। आखिर मुआवजे में मिला 2 या 3 लाख रुपये से कितने दिन घर चलाते?
इतना ही नहींजूनागढ़ के जैतपुरबेरवाल के बीच बन रहे हाइवे के लिए किसानों की 720 एकड़ जमीन छीन ली गयी। इसके खिलाफ जब किसानों ने आन्दोलन कियातो पुलिस ने आन्दोलन का दमन करने के लिए किसानों पर बर्बरतापूर्वक लाठी चलायी। सरकार ने 289 किसानों को गिरफ्तार कर लियाताकि किसान आन्दोलन को तोड़ा जा सके। लेकिन फिर भी किसान आन्दोलन उग्र रूप लेता जा रहा है। अब किसान किसी भी कीमत पर जमीन देने के लिए तैयार नहीं है। एक नाटकीय घटना में किसानों की स्त्रियों ने मदद के लिए मोदी को खून से लिखा खत भेजा। क्योंकि मोदी ने प्रचार के दौरान अपने जोशीले अंदाज में कहा था कि “हेमेरी गुजरात की बहनोंआपको कोई समस्या हो तो मुझे 50 पैसे के एक पोस्टकार्ड पर चिट्ठी लिख भेजनामैं आपकी सभी समस्याओं को दूर कर दूँगा ” लेकिन  तो किसी ने किसानों की बात सुनी और  ही उनकी स्त्रियों द्वारा खून से लिखी चिट्ठी ही काम आयी।
न्यूनतम मजदूरी 
एनएसएसओ (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थानके अनुसारगुजरात के शहरी इलाकों में दिहाड़ी मजदूरी की दर 106 रुपये हैजबकि केरल में यह 218 रुपये है। गुजरात के ग्रामीण इलाकों में यह 83 रुपये है। दिहाड़ी मजदूरी के मामले में देश भर में गुजरात 12वें स्थान पर है। पहले स्थान पर पंजाब है जहाँ गावों में दिहाड़ी 152 रुपये है। मोदी ने ‘वाइब्रेंट गुजरात सम्मलेन’ में कहा कि “गुजरात में मजदूरी की कोई समस्या नहीं है।” सूरत में इसके एक हफ्ते बाद 30 हजार पावरलूम मजदूरों ने कम मजदूरी का विरोध करते हुए चक्का जाम कर दिया और पुलिस के हिंसक दमन के बाद उग्र होकर कई गाड़ियों में आग लगा दी। सन 2011 में मारूतिसुजुकी कम्पनी के दमनउत्पीड़न के खिलाफ मजदूरों ने हड़ताल कर दीतो सुजुकी कम्पनी को लुभाने के लिए मोदी जापान पहुँच गये और कम्पनी को हरियाणा में अपना प्लांट बंद करके गुजरात आने का निमंत्रण दे डाला। दरअसल गुजरात में निवेश का माहौल बनाने के लिए किसानों की जमीनों पर कब्जा करके उसे औनेपौने दामों में उद्योगपतियों को बेचा जा रहा है। उन्हें सस्ते दर पर कर्जबिजली और अन्य साधन मुहैया किया जा रहा है। दूसरी ओरमजदूर यूनियनों का दमन करके उन्हें नखदन्त विहीन बना दिया गया है। यही कारण है कि अम्बानीअदानीटाटा और दूसरे औद्योगिक घराने मोदी के नेतृत्व का गुणगान करते नहीं अघाते।
मोदी के विकास के दावे और हकीकत के बीच कितना अन्तर हैइसे भी देख लेते हैं। उन्होंने दावा किया कि गुजरात ने सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों के संचालन के लिए उच्चस्तरीय पेशेवर संस्कृति विकसित की है। इनकी कार्यक्षमता में गजब का सुधार आया है। लेकिन मार्च 2013 में सार्वजनिक कम्पनियों पर कैग ने एक रिपोर्ट बनायी हैजिसमें गुजरात सरकार के दावे की कलई खुल जाती है। यह रिपोर्ट बताती है कि कुछ ही सार्वजनिक कम्पनियाँ मुनाफा कमा रही हैंलेकिन अधिकतर कम्पनियों के वित्तीय प्रबन्धनयोजना और उन्हें लागू करवाने में भारी कमियाँ हैं। इनका कुल घाटा 4052 करोड़ रुपये है। गुजरात में 2012 के विधानसभा चुनाव के समय मोदी ने प्रत्येक जिले में एक दिन उपवास रखकर अपना सद्भावना मिशन पूरा किया। उन्होंने प्रत्येक जिले में विकास कार्यों के लिए बड़ी वित्तीय राशि जारी करने का वचन दिया। सभी जिलों को मिलाकर यह राशि 39,769 करोड़ रुपये बैठती है। अमरेली और दाहोद के जिलाधिकारियों ने इस बात से इन्कार किया कि अब तक विकास कार्यों के लिए कोई बड़ी राशि प्रदेश सरकार की तरफ से उन्हें मिली है। गुजरात के राजकीय वित्त विभाग और प्रशासन विभाग ने इस बारे में कोई जानकारी देने से इन्कार किया है। जबकि सद्भावना मिशन में जनता के टैक्स का 160 करोड़ रुपया पानी में बहा दिया गया। क्या यह वादा खिलाफी की हद नहीं है?
विकास की हवा 
दरअसल गुजरात सरकार इस मामले में भाजपा की पुरानी परम्परा को ही निभा रही है। 1997–98 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अयोध्या में राम मन्दिर बनानेभ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करके स्वदेशी अपनाने का वादा किया था। केन्द्र में सरकार बनाते ही वह सभी वादों को भूल गयी। राम मन्दिर का क्या हुआयह सभी जानते हैं। अब तक भाजपा के दो अध्यक्ष और कई बड़े नेता भ्रष्टाचार में लिप्त पाये गये। अपने शासनकाल में भाजपा ने सैकड़ों विदेशी वस्तुओं के आयात से प्रतिबंध हटाकर उनको मँगाये जाने का रास्ता साफ किया। नतीजाउत्तरप्रदेश के सबसे बड़े गढ़ से भाजपा का बुरी तरह सफाया हो गया। उस सरकार के मुखियाअटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व के आगे नरेंद्र मोदी तो कहीं ठहरते भी नहीं।
छवि चमकाने पर विशेष ध्यान 
मोदी की छवि और गुजरात सरकार की उपलब्धियों को चमकाने का ठेका एक अमरीकी कम्पनी एप्को को दिया गया है। वे इस काम के लिए हर महीने 17 लाख रुपये देते हैं। मोदी की तरह नाइजीरिया के पूर्व तानाशाह सानी अबाचाकजाखिस्तान के राष्ट्रपति नूर सुलतान नजरबायेव और माफिया मिखाइल खोदोरसकी से जुड़े रूसी नेता भी इस कम्पनी के ग्राहक हैं। युद्ध भड़काने के लिए जनता को तैयार करनातानाशाहों का बचाव करनानेताओं को चुनाव जीतने के तिकड़म सिखाना और बड़ी कम्पनियों को मुनाफे की तरकीब सिखाना इस कम्पनी का खास धंधा है। इसने ईराक पर युद्ध थोपने के लिए पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री टोनी ब्लेयर के पक्ष में हवा बनायी थी। मोदी के पक्ष में झूठ को सच और सच को झूठ बनाने की कला के पीछे एप्को का ही हाथ है। एप्को ही मोदी के भाषण लिखवाता हैउनके पक्ष में हवा बनाता और फेसबुक और ट्वीटर जैसी सोशल मीडीया को चलाता है। एप्को की कृपा से ही गुजरात सरकार की नैनो घोटाले की खबर अखबार के किसी कोने में नहीं छपती है। टाइम्स नाऊ और एनडीटीवी पर महाराष्ट्र के किसानों की दुर्दशा की खबरें तो आती हैंलेकिन गुजरात के किसानों की आत्महत्या या उनके आन्दोलनों की कोई खबर नहीं दिखती। 2009 से पहले गुजरात सरकार सिर्फ 840, 1200 या 9000 अरब रुपये विकास पर खर्च करने के वादे करती थी। लेकिन एप्को की कृपा से उसका वादा अब 30,000 अरब रुपये के पार चला गया हैलेकिन इस कथनी को करनी में बदलने की दर गिरकर डेढ़ प्रतिशत तक पहुँच गयी है। हद तो तब हो गयी जब दो दिन के अन्दर 15,000 गुजरातियों को उत्तराखंड के आपदाग्रस्त दुर्गम इलाके से निकालकर उनके घर का धपोर शंख बजाया गया। इतनी ऊँची डींग हाँकने के कारण उनकी देशभर में बहुत किरकिरी हुई। आखिर झूठ बोलने की भी कोई सीमा होती है।
दो साल से एप्को द्वारा गुजरात सरकार की छवि सुधारने की कोशिश रंग ला रही है। मोदी के अंधभक्तों की संख्या बढ़ती जा रही है। ये लोग सच्चाई से कोसों दूर हैं और गुजरात के विकास की असलियत से मुँह चुराते हैं। इनका मानना है की कांग्रेस पार्टी गुजरात सरकार को बदनाम करने के लिए ऐसी खबरें उड़ा रही है। लेकिन कैग और एनएसएसओ जैसी संस्थाओं ने कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार का भी पर्दाफाश किया है। इन्होंने ही गुजरात सरकार की असलियत को भी उजागर किया है। जिन पाँच एजेंसियों और संस्थाओं के आँकड़े यहाँ दिये गये हैंवे पूरी तरह संविधान के दायरे में काम करती हैं और सर्वेक्षण और जाँच के मामले में इनकी तकनीक सबसे बेहतर और विश्वसनीय मानी जाती है।
भ्रष्टाचार प्रेम 
गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार प्रेम के बारे में भी जान लेना रोचक होगा। सूचना अधिकार से मिली जानकारी के अनुसार गुजरात सरकार ने टाटा को नैनो कार की एक परियोजना के लिए 9570 करोड़ का कर्ज दियाजबकि उस परियोजना की कुल लागत इससे बहुत कम 2900 करोड़ रुपये है। कमाल की बात यह है कि टाटा को यह कर्ज 20 साल बाद लौटाना है जिस पर ब्याज की दर 0.1 प्रतिशत है। टाटा और गुजरात सरकार के बीच लॉबिंग (दलालीका काम नीरा राडिया ने कियाजो टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में लॉबिंग के आरोप से घिरी थीं और टाटा के साथ फोन पर गैरकानूनी तरीके से काम कराने से सम्बन्धित उनकी बातचीत का पर्दाफाश हो चुका है। नैनो घोटाले में कुल एक लाख करोड़ की अनियमितता पायी गयी है। एक साल पहले इशाक मराडीया ने गुजरात के मत्स्य पालन मंत्री पुरुषोत्तम सोलंकी के खिलाफ 400 करोड़ के मत्स्य घोटाले की पुलिस जाँच की माँग की थी। इसे संज्ञान में लेते हुए गुजरात उच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया। जून 2011 में 2 लाख करोड़ के कांडला बंदरगाह भूमि घोटाले का खुलासा हुआ। गुजरात सरकार ने कांडला बंदरगाह की लगभग 16 हजार एकड़ जमीन मात्र 144 रुपये प्रति एकड़ की दर से किराये पर नमक बनाने वाली कम्पनी को दे दीजो बाजार भाव से बहुत ही कम है। गुजरात सरकार के आँकड़ों पर यकीन करें तो पता चलता है कि गौतम अदानी के पावर प्लांटबंदरगाह और विशेष आर्थिक क्षेत्र सेज के लिए गुजरात सरकार ने 131 हजार करोड़ रुपये दियेकई अन्य घोटालों में भी अदानी का नाम शामिल है। इतना ही नहीं अदानी की कम्पनियाँ मुन्द्रा बन्दरगाह और सेज के इलाकों में पानी के बहाव को रोककर सदाबहार वर्षा वनों का नाश कर रही हैं और मोदी पर्यावरण संरक्षण पर भाषण देते फिर रहे हैं। महुआ और भावनगर के 25 हजार किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैंक्योंकि सरकार ने वहाँ 268 हेक्टेयर जमीन निरमा कम्पनी को सीमेंट का प्लांट बनाने के लिए दी है। इसमें से 222 हेक्टेयर जमीन पर एक खूबसूरत झील मौजूद हैजिसे भर कर कम्पनी उसका नामोनिशान मिटा देगी।
गुजरात हाईकोर्ट ने अप्रैल 2013 में एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कारपोरेशन (जीएसपीसीको नोटिस भेजा और सीबीआई को के जी बेसिन गैस और तेल घोटाले की जाँच का आदेश दिया। आन्ध्र प्रदेश के कृष्णागोदावरी की घाटी में 64,000 अरब क्यूबिक फीट गैस मिली है। कच्चे अनुमान के हिसाब से इसकी कुल कीमत लगभग 50 लाख करोड़ है। यह गैस का इतना बड़ा भण्डार है कि अगर देशवासियों को मुफ्त में गैस सिलेंडर दिया जाये तो वह 60 साल के लिए पर्याप्त होगी। गैस के इस पूरे भण्डार पर रिलायन्स कम्पनीविदेशी गैस और तेल कम्पनी जीओगुजरात स्टेट पेट्रोलियम कारपोरेशन और ओएनजीसी का कब्जा है। सैकड़ों निजी कम्पनियों के मालिकों और मैनेजरोंसरकारी अफसरों और भाजपाकांग्रेस के नेताओं ने मिलबाँटकर यह खिचड़ी पकायी और भरभर पेट खा गये। बेहयाई का आलम यह है कि गैस के मुफ्त भण्डार पर कब्जा करने के बावजूद भी उन्हें संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने गैस सिलेंडर का  केवल दाम बढ़ा दियाबल्कि एक परिवार को सालाना मिलने वाले सिलेंडरों की संख्या भी सीमित कर दी और लोगों को गुमराह करने के लिए इस पर तरहतरह की राजनीति करने लगे। यहाँ गुजरात सरकार से सम्बन्धित कुछ एक घोटालों की झलक दी गयीलेकिन घोटालों की यह सूची बहुत लम्बी है।
गुजरात- गरीबी के पारावार में विकास की मीनार (भाग 1)
गुजरात- गरीबी के पारावार में विकास की मीनार (भाग 3)