बुधवार, 11 दिसंबर 2013

गुजरात- गरीबी के पारावार में विकास की मीनार (भाग 3)

फूट डालो और राज करो
मोदी के अन्धभक्तों का कहना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में हारजीत का फैसला मोदी के विकास मॉडल पर ही होगा। इसीलिए भाजपा के भीतर काफी उठापटक के बाद मोदी को प्रधानमंत्री पद का भावी उम्मीदवार भी घोषित कर दिया गया। लेकिन देश के लोकतंत्र और चुनाव के बारे में मामूली ज्ञान रखने वाला इंसान भी जानता है कि यहाँ चुनाव जीतने के लिए धर्म और जाति के आधार पर उम्मीदवार खड़े करनाचुनाव के समय झूठे वादे करनासाम्प्रदायिक दंगे भड़काकर हिन्दूमुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करनावोट खरीदनाशराब पिलानाबूथ कब्जाना और तरहतरह के आपराधिक हथकंडे ही जीतहार का फैसला करते हैं। यह भी तर्क दिया जाता है कि उम्मीदवार यदि ईमानदार है तो गलत तरीके से चुनाव जीत कर भी काम करेगा। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि गलत उपाय भी तो गलत उम्मीदवार ही अपनाता है। दूसरे ताजा और अच्छा सेब भी सड़े सेब की टोकरी में रखने पर सड़ जाता है। फिर राजनीतिक पार्टियों में ईमानदार उम्मीदवार गुलर के फूल हो गये हैं। चुनावी बारिश आते ही नेता मेढक की तरह टर्राकर अपने विकास का राग अलापने लगते हैं जबकि देश में कुकरमुत्ते की तरह उग आये उनके एजेन्ट जनता को लगातार गुमराह करने की कोशिश करते रहते हैं। “फूट डालो और राज करो” नारे से रोम के गुलाम मालिकों से लेकर अंग्रेज हुक्मरानों तक ने सैकड़ों सालों तक लोगों को गुलाम बनाकर राज किया। लेकिन इतिहास में कई मिसालें हैं जब गुलामों ने आपसी भेद भुलाकर शासक वर्ग को कड़ी चुनौती दी। 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हमारी आजादी की लड़ाई में एक ऐसी ही शानदार मिसाल है। उस दौरान हिन्दूमुस्लिम की एकजुट ताकत ने यूनियन जैक का झण्डा झुका दिया था। इंग्लैण्ड की सरकार भय से काँप उठी थी। इससे सबक लेते हुए अंग्रेजों ने हिन्दूमुस्लिम के बीच दंगे भड़काये और भारतपाक का बँटवारा करके  केवल देश को लूटा और कमजोर बना दियाबल्कि राष्ट्र की आत्मा को भी रौंद दिया। आजादी के बाद कांग्रेस और भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों ने ‘फूट डालो और राज करो’ के इस नारे को हाथोंहाथ लिया। उन्होंने जिन्दगी के हर क्षेत्र में इसे लागू करके मेहनतकश जनता की एकता को छिन्नभिन्न कर दिया। सत्ता की कुर्सी पर काबिज होने के लिए वे आज भी जातिवादसाम्प्रदायिकता और क्षेत्रवाद के आधार पर जनता में नफरत फैला रहे हैं। समयसमय पर वे इसमें विकास का तड़का भी लगा देते हैं। इसी रास्ते पर चलते हुए नरेन्द्र मोदी ने अपने शासन के दौरान 2002 में मुसलमानों का नरसंहार करवाया और बहुसंख्य हिंदुओं की सहानुभूति हासिल करके गुजरात की सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की। आज वे गुजरात के बहुसंख्य लोगोंकिसानोंमजदूरों और बेरोजगार नौजवानों की छाती पर मूँग दलते हुए “गरीबों की लूट और अमीरों को छूट” की कांग्रेसी नीति का अनुसरण ही कर रहे हैं। वे गुजरात में पूँजीपतियों को हर तरह की सुविधा देते हुए गरीबी के पारावार में पूँजीवादी विकास की मीनार खड़ी कर रहे हैं।
कांग्रेस की नीतियों के उत्तराधिकारी 
दरअसल 1991 में देश में लागू हुई वैश्वीकरणनिजीकरण और उदारीकरण की नीतियों पर सभी राजनीतिक दलों में आम सहमति है। गरीबों को लूटकर अमीरों की तिजोरी भरने का ही नतीजा है कि जहाँ एक ओर दुनिया के कुल भुखमरी के शिकार बच्चों में से आधे भारत में है और 80 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं तो दूसरी ओर देश में अरबपतियों की संख्या 6000 से ऊपर पहुँच गयी हैजबकि अमरीका और पूरे यूरोप को मिलाकर यह संख्या 3000 है। यही वजह है कि देश में 8200 धनी परिवारों के पास देश की 70 प्रतिशत से अधिक सम्पत्ति है और बाकी 120 करोड़ के पास 30 प्रतिशत। इन्होंने देश को लूटकर कंगाल बना दिया है। इस लूट में पूँजीपतिनेताअफसरमाफिया और ठेकेदार अपने धार्मिक और जातिवादी भेदभाव भुलाकर लिप्त हो गये हैं। एक ही परिवार के कुछ लोग भाजपा में हैं तो कुछ कांग्रेस में। ये दोनों हाथों से मलाई मार रहे हैं। एकदूसरे के खिलाफ बयानबाजी तो हमारी आँखों में धूल झोंकने के लिए है। लेकिन अब वह दिन दूर नहीं जब लोग इनके षड्यंत्रों को समझेंगे और जनता के बीच एक सच्ची एकता स्थापित होगी।
 शौचालय बनाना जरूरी 
गुजरात का एक विकास मॉडल यह भी दिल्ली में एक सभा को सम्बोधित करते हुए नरेन्द्र मोदी ने कहा कि मंदिर से पहले शौचालय बनाना जरूरी है। मजेदार बात यह कि कुछ समय पहले जब यही बात जयराम रमेश ने कही थीतो संघ परिवार के लोगों ने उसे भारतीय संस्कृति का अपमान बताते हुए जयराम रमेश के आवास के सामने सामूहिक रूप से पेशाब करके विरोध जताया था। जाहिर है कि प्रधानमन्त्री पद के दावेदार मोदी के इस बयान के पीछे विवाद में बने रहकर लोकप्रियता हासिल करना ही है।
लेकिन इसी बहाने हम देखें कि गुजरात में शौचालयों की दशा कैसी है। गुजरात के सबसे समृद्ध शहर अहमदाबाद में शौचालयों की हालत पर हाल ही में मानव गरिमा संस्था ने एक सर्वे रिपोर्ट प्रकाशित की है। रिपोर्ट के मुताबिक अहमदाबाद शहर में हाथ से पाखाना उठाने की घिनौनी प्रथा आज भी जारी हैजिससे वहाँ का शासनप्रशासन बारबार इन्कार करता है। सर्वे के दौरान वहाँ 188 उठाऊ पाखाने पाये गयेजबकि अहमदाबाद नगरपालिका क्षेत्र में 126 जगहों पर हाथ से पाखाना साफ करने का चलन देखा गया। 1993 में हाथ से मैला साफ करने वाले लोगों को काम पर रखने और उठाऊ शौचालय बनाने के खिलाफ कानून बना था। इस कानून में यह प्रावधान है कि जो भी ऐसा करेगाउसे एक साल तक की सजा और 2000 रुपये तक का जुर्माना देना होगा। इस कानून का सही ढंग से पालन  होने की कई शिकायतें सर्वोच्च न्यायालय में लम्बित हैं। कानून बने 10 साल हो गयेलेकिन यह प्रथा अभी तक जारी है। 1993 में कानून बनाकर हाथ से मैला साफ करने पर रोक लगाये जाने के बावजूद अहमदाबाद नगरपालिका ने सफाई कर्मचारियों को कोई उपकरण मुहैया नहीं किया। अधिकांश कर्मचारी केवल झाडू और लोहे की पट्टी से पाखाना साफ करते हैं। इन कर्मचारियों में भारी संख्या में अस्थायी कर्मचारी हैं जो वहाँ पिछले 10 सालों से काम कर रहे हैं। वे ठेकेदारी प्रथा के अधीन काम पर रखे गये हैं जिन्हें 90 रुपये रोज की दिहाड़ी मिलती है। उनकी  तो कोई सेवा शर्त है और  ही जीवन बीमा या स्वास्थ्य बीमा। झुग्गीझोपडी के आसपास जो सार्वजनिक शौचालय हैंउनकी हालत खस्ता हैवहाँ  दरवाजे हैं पानी की टोंटी और  ही रोशनी इन्तजाम। आबादी के हिसाब से इन शौचालयों की संख्या भी बहुत कम है। गरीब माँबाप बच्चों के शौचालय जाने का खर्चा नहीं उठा पातेइसीलिए ज्यादातर बच्चे खुले में ही शौच करते हैं। गुजरात सरकार ने गत 21 जून से 26 जून के बीच सभी बड़े शहरों और 195 नगरों में हाथ से मैला सफाई पर सर्वेक्षण करने की अधिसूचना जारी की थी लेकिन ऐसा कोई सर्वेक्षण नहीं किया गया। निजी ठेकेदारों और नगरपालिका अधिकारियों के डर से कि कहीं वे नौकरी से निकाल दिये जायेंकोई भी सफाईकर्मी हाथ से मैला साफ करने से मना नहीं कर पाता। इस अमानुषिक और घृणित प्रथा के बारे में नरेन्द्र मोदी के विचार को देखते हुए गुजरात में इस प्रथा के बने रहना कोई अजूबा नहीं है।
अपनी पुस्तक ‘कर्मयोगी’ में उन्होंने लिखा था– “मैं नहीं समझता कि वे यह काम (हाथ से मैला उठानाकेवल अपनी आजीविका कमाने के लिए कर रहे हैं  अगर ऐसा होतातो वे पीढ़ीदरपीढ़ी इस तरह के काम को लगातार  करते किसी विशेष समय परकिसी को ज्ञानोदय प्राप्त हुआ होगा कि यह उनका (वाल्मीकि समुदाय काकर्तव्य है कि वे पूरे समाज और प्रभुओं की खुशी के लिए यह काम करें कि उन्हें यह काम (हाथ से मैला उठाने का कामइसलिए करना है कि भगवान ने उन्हें यह काम एक आंतरिक आध्यात्मिक साधना की तरह सदियों तक चलाते रहने के लिए सौंपा है ” क्या नरेन्द्र मोदी यही विकास मॉडल और ऐसे ही विचार पूरे देश पर थोपने का ख्वाब देख और दिखा रहे हैं ?

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